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यहोशू: विजय के बाद, क्या?
कई बार, परमेश्वर हमें विजय की मिठास का स्वाद लेने की अनुमति देता है। हम उसकी सुरक्षा और प्रावधान का हाथ देखते हैं। एक लक्ष्य पूरा हो गया है । या एक घोर पाप दूर हो गया है। विजय वहाँ है, और हम इस क्षण का मज़ा उठाते हैं। फिर प्रश्न उठता है: आगे क्या? हम यहाँ से कहाँ जायेंगे? हम उस विजय में कैसे चलेंगे? हम परमेश्वर पर उसी निर्भरता को कैसे बनाए रखें जो लड़ाई लगने के दौरान हमारे पास थी ?
यहोशू ने वे सभी प्रश्न पूछे होंगे । उसने यरीहो में एक महान विजय का अनुभव किया था, सिर्फ ए में हार का अनुभव करने के लिए। पश्चाताप करने के बाद और इस्राएल की संतान को पश्चाताप करने के लिए नेतृव्त किया, उसने उन्हें ऐ पर अधिकार करने के लिए नेतृत्व किया। अब जब उसने एक और विजय देखी, तो वह यरीहो की विजय से अलग क्या करेगा ? वह जानता होगा कि यह एक विकट क्षण था। हार एक महान जीत से पहले या बाद में अक्सर अपना सिर दिखाती है। यहोशू जानता था कि ऐ में जीत के बाद उसे किस बात का ध्यान रखना चाहिए ।
बाइबल कहती है कि उसने लोगों को इकट्ठा किया और एक वेदी बनाई। “तब यहोशू ने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिये एबाल पर्वत पर एक वेदी बनवाई,” (यहोशू 8:30)। विजय के पश्चात पहला कार्य आराधना था। यहोशू को जानता था कि यरीहो और ए की विजय में उनका ध्यान पूर्ण तौर पर परम्मेश्वर पर केंद्रित था । इसलिए, उसने तुरंत लोगों का ध्यान परमेश्वर पर भी केंद्रित करवाया। बहुत बार हम अपना ध्यान विजेता से हटा लेते हैं और विजय पर केंद्रित करते हैं। आस्तिक के जीवन में हर विजय का स्रोत और निर्वाहक स्वयं परमेश्वर है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमें विजय में फसना नहीं है, बल्कि विजेता पर केंद्रित रहना चाहिए।
परमेश्वर की आराधना का केंद्र परमेश्वर का वचन है। इसलिए यहोशू ने “उसके बाद उसने आशीष और शाप की व्यवस्था के सारे वचन, जैसे जैसे व्यवस्था की पुस्तक में लिखे हुए हैं, वैसे वैसे पढ़ पढ़कर सुना दिए।” (यहोशू 8:34)। यहोशू इस्राएल की संतान को उनकी जड़ों में वापस ले गया। उसने पढ़ा जो परमेश्वर ने अतीत में कहा था और उन्हें याद दिलाया कि परमेश्वर बदलता नहीं है । उसने उन्हें लिए “व्यवस्था के सभी शब्द” पढ़े। मुझे बोध है कि एक महान विजय के पश्चात हमें भी तुरंत परमेश्वर के वचन की ओर मुड़ना चाहिए। परमेश्वर का वचन न सिर्फ विजय के मार्ग पर ले जाता है, बल्कि हमें विजय के मार्ग पर भी बनाए रखता है।
यहोशू ने परमेश्वर के वचन के माध्यम से, चुने हुए लोगों को याद दिलाया कि उन्हें लगातार बनाना चाहिए। प्राप्त करने के लिए आशीषें थी, लेकिन संभावित शाप भी थे। चुनाव उन्हीं का था। यदि वे परमेश्वर की ओर अपनी दृष्टि रखते और उसके वचन का पालन करते, तो भंडार में और भी अधिक आशीषें होती । लेकिन यदि वे परमेश्वर से नज़रें हटा लेते और उसकी अनाज्ञाकारी करते, तो उनके भविष्य में शाप होते । चुनाव सरल था। उनकी हालिया विजय ने उन्हें भविष्य के किसी शाप से मुक्त नहीं किया। उन्होंने विजय का अनुभव किया था, लेकिन यह आवश्यक था कि वे विजय के मार्ग पर चलते रहें।
यहोशू की दिन प्रति दिन की विजय के अनुभव के बारे में एक अंतिम टिप्पणी थी । उसने न सिर्फ परमेशवर आराधना की और लोगों को परमेश्वर के वचन याद दिलाया, बल्कि वह शास्त्रों को संभालने में भी बहुत सावधान था। उसने कोई अच्छा महसूस कराने वाले वचन को नहीं उठाया और चुना । उसने उन्हें कठिन चीजों को भी पढ़ा और याद दिलाया। बाइबल कहती है, “जितनी बातों की मूसा ने आज्ञा दी थी, उन में से कोई ऐसी बात नहीं रह गई जो यहोशू ने इस्राएली की सारी सभा, और स्त्रियों, और बाल-बच्चों, और उनके साथ रहने वाले परदेशी लोगों के साम्हने भी पढ़कर न सुनाईं॥” (यहोशू 8:35)। यह अक्सर ऐसा होता है कि एक महान विजय के पश्चात, हम एक दूसरे को पीठ पर थपथपाना चाहते हैं, इस बारे में बात करते हैं कि हम कितने महान हैं, और जो कुछ हासिल किया है उसके विषय में बात करते हैं । लेकिन यहोशू ने उन्हें सब कुछ याद दिलाया जो परमेश्वर ने कहा था: महान आशीषें और भयानक शाप, अद्भुत वायदे और गंभीर निर्णय। उसने पूरी कहानी बताई, इसका हिस्सा नहीं। यह विजयी नेतृत्व का रहस्य है।
यहोशू 8:30-3530
तब यहोशू ने इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के लिये एबाल पर्वत पर एक वेदी बनवाई, 31 जैसा यहोवा के दास मूसा ने इस्राएलियों को आज्ञा दी थी, और जैसा मूसा की व्यवस्था की पुस्तक में लिखा है, उसने समूचे पत्थरों की एक वेदी बनवाई जिस पर औजार नहीं चलाया गया था। और उस पर उन्होंने यहोवा के लिये होम-बलि चढ़ाए, और मेलबलि किए। 32 उसी स्थान पर यहोशू ने इस्राएलियों के साम्हने उन पत्थरों के ऊपर मूसा की व्यवस्था, जो उसने लिखी थी, उसकी नकल कराई। 33 और वे, क्या देशी क्या परदेशी, सारे इस्राएली अपने वृद्ध लोगों, सरदारों, और न्यायियों समेत यहोवा की वाचा का सन्दूक उठाने वाले लेवीय याजकों के साम्हने उस सन्दूक के इधर उधर खड़े हुए, अर्थात आधे लोग तो गिरिज्जीम पर्वत के, और आधे एबाल पर्वत के साम्हने खड़े हुए, जैसा कि यहोवा के दास मूसा ने पहिले आज्ञा दी थी, कि इस्राएली प्रजा को आर्शीवाद दिए जाएं। 34 उसके बाद उसने आशीष और शाप की व्यवस्था के सारे वचन, जैसे जैसे व्यवस्था की पुस्तक में लिखे हुए हैं, वैसे वैसे पढ़ पढ़कर सुना दिए। 35 जितनी बातों की मूसा ने आज्ञा दी थी, उन में से कोई ऐसी बात नहीं रह गई जो यहोशू ने इस्राएली की सारी सभा, और स्त्रियों, और बाल-बच्चों, और उनके साथ रहने वाले परदेशी लोगों के साम्हने भी पढ़कर न सुनाईं॥
Book of the Month
Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe. For all other books…
सेमी टिपित सेवकाई के विषय में
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