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एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

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एक आज्ञाकारी मन के साथ प्रार्थना करना

प्रार्थना का एक ऐसा क्षेत्र है जिसके बारे में मैं आमतौर पर लोगों को बात करते नहीं सुनता हूँ और वह क्षेत्र है आज्ञाकारिता और प्रार्थना का सम्बन्ध। मसीहीयत के आरम्भिक समयों में, मसीही सन्यासी अपने आप को दुनियादारी से अलग कर लेते और वह सब चीज़ों से दूर कहीं कोई एकान्त स्थान ढूँढ कर अपने आप को पूरी तरह से प्रार्थना में लौलीन कर लेते थे। प्रार्थना के ऐसे योद्धा बनने के लिए उन्हें अक्सर बहुत बलीदान करना पड़ता था।

परन्तु, प्रार्थना के इस प्रकार के व्यवहार में भी कुछ कमी लगती है। कृपया मुझे गलत न समझें। कई बार हमें ऐसे समयों की आवश्‍यकता होती है जब हम अलग कोई शान्त स्थान ढूँढ सकें। यीशु ऐसा करते थे। यदि उन्हें एकान्त की इतनी आवश्‍यकता थी तो हमें इसकी कितनी अधिक आवश्‍यकता है कि हम अलग होकर परमेश्‍वर के साथ समय बिता सकें। परन्तु जब हम यीशु के जीवन को देखते हैं तो स्पष्ट है कि उनका एकान्त स्थान कहीं दूर बसा हुआ कोई मठ नहीं था। वह दूसरों की आवश्‍यकताएँ पूर्ण करने, चोट खाए हुओं को चंगा करने और लोगों का मेल परमेश्‍वर से कराने के कार्य के लिए समर्पित थे। वह पूरी तरह से पिता के कार्य को समर्पित थे। वह पिता की आवाज़ सुनने के लिए एकान्त में जाते थे और पिता से बात करने के बाद वह वापस अपने कार्य में लग जाते थे।

यीशु ने अपने शिष्यों से कहा, “मैं अपने आप से कुछ नहीं कर सकता; जैसा सुनता हूँ, वैसा न्याय करता हूँ, और मेरा न्याय सच्चा है; क्योंकि मैं अपनी इच्छा नहीं, परन्तु अपने भेजने वाले की इच्छा चाहता हूँ” (यूहन्ना 5:30)। यीशु पिता की आवाज़ को सुनते थे और फिर वह पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए निकल पड़ते थे। उनकी प्रार्थना और आज्ञाकारिता में एक अटूट सम्बन्ध था।

बल्कि, यीशु ने एक व्यक्ति के विषय में एक दृष्टाँत बताया जिसे पीटा और लूट लिया गया था। दो धर्मी लोग उस घायल व्यक्ति के पास से गुज़रे परन्तु वह अपने धार्मिक कार्यों में इतने अधिक व्यस्त थे कि उन्होंने उसकी कोई सहायता न की। परन्तु तभी एक सामरी ने उस घायल व्यक्ति को देखा और रुककर उसकी सहायता की। यीशु ने एक महत्वपूर्ण प्रश्‍न पूछा, “अब तेरी समझ में जो डाकूओं में घिर गया था, इन तीनों में से उसका पड़ोसी कौन ठहरा?” (लूका 10:36)। व्यवस्थापक ने यीशु को उत्तर दिया, “वह जिसने उस पर दया दिखाई।” फिर यीशु ने उससे कहा, “जा और तू भी ऐसा ही कर” (लूका 10:37)।

वचन के इस भाग का साफ-साफ अर्थ यह है कि हम अपनी धार्मिक जिम्मेदारियों में ही इतने न उलझ जाएँ कि संसार के दर्द और आवश्‍यकताओं को अनदेखा कर दें। जब हम यीशु के जीवन को देखते हैं तो हमें पृथ्वी पर जन्म लेने वाला एक सबसे संतुलित व्यक्ति दिखाई देता है। वह अपने पिता के संग समय बिताने के लिए एकान्त में जाता था। परन्तु ऐसा करते हुए भी उसने अपने जीवन को निरन्तर दूसरों के लिए समर्पित रखा। यीशु ने प्रार्थना की और आज्ञाकारिता की। उसने सुना और सेवा की।

परमेश्‍वर की शक्ति इसी सन्दर्भ में प्रमाणित हुई। जो जीवन एकान्त में परमेश्‍वर के साथ समय बिताता है और फिर वहाँ जाता है जहाँ मानवजाति की पीड़ा सहायता के लिए पुकार रही है, ऐसे जीवन के विषय में कुछ बहुत ही शक्तिशाली बात है। जब एक ही हृदय में प्रार्थना और आज्ञाकारिता बहते हैं तो इसके परिणामस्वरूप परमेश्‍वर की शक्ति और प्रेम अद्वभुत रीति से प्रकट होता है। एक पुराना गीत है जो इस प्रकार से है, “भरोसा रखो और आज्ञा मानो, क्योंकि भरोसा रखने और आज्ञा मानने के अलावा यीशु में आनन्दित रहने का और कोई तरीका नहीं है।” यीशु हमसे कहता है, “प्रार्थना करो और आज्ञा मानो। प्रार्थना और आज्ञाकारिता के सिवाय परमेश्‍वर की शक्ति को जानने का और कोई तरीका नहीं है।”

लूका 10 :29-37

29परन्तु उस ने अपनी तईं धर्मी ठहराने की इच्छा से यीशु से पूछा, तो मेरा पड़ोसी कौन है? 30यीशु ने उत्तर दिया; कि एक मनुष्य यरूशलेम से यरीहो को जा रहा था, कि डाकुओं ने घेरकर उसके कपड़े उतार लिए, और मार पीट कर उसे अधमूआ छोड़कर चले गए। 31और ऐसा हुआ; कि उसी मार्ग से एक याजक जा रहा था: परन्तु उसे देख के कतरा कर चला गया। 32इसी रीति से एक लेवी उस जगह पर आया, वह भी उसे देख के कतरा कर चला गया। 33परन्तु एक सामरी यात्री वहां आ निकला, और उसे देखकर तरस खाया। 34और उसके पास आकर और उसके घावों पर तेल और दाखरस डालकर पट्टियां बान्धी, और अपनी सवारी पर चढ़ाकर सराय में ले गया, और उस की सेवा टहल की। 35दूसरे दिन उस ने दो दिनार निकालकर भटियारे को दिए, और कहा; इस की सेवा टहल करना, और जो कुछ तेरा और लगेगा, वह मैं लौटने पर तुझे भर दूंगा। 36अब तेरी समझ में जो डाकुओं में घिर गया था, इन तीनों में से उसका पड़ोसी कौन ठहरा? 37उस ने कहा, वही जिस ने उस पर तरस खाया: यीशु ने उस से कहा, जा, तू भी ऐसा ही कर॥

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

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