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एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

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जयवंत यीशु

जैसा कि हम विश्वास के योद्धाओं के इस अध्ययन के अंत के करीब हैं, मैंने परम विजयी व्यक्ति: जीवित प्रभु यीशु के बारे में लिखना उचित समझा। वह इस ग्रह पर कृपा करने वाले सबसे अनूठे मनुष्य हैं। वह परमेश्वर था, है, और हमेशा रहेगा। फिर भी उसने एक मनुष्य का रूप ले लिया। उनकी दिव्यता में, हम उसकी अनंत  विशेषताओं को देखते हैं। यह हमें उसकी दिव्य शक्ति को जानने में सक्षम बनाता है। फिर भी उसकी मानवता में, हम उस के दीन सेवक हैं। यह हमें परमेश्वर के प्रेम का अनुभव करने में सक्षम बनाता है।

यीशु नामक व्यक्ति में एक महान रहस्य है। एक रहस्य इतना अद्भुत है, जो मानव इतिहास में अन्य सभी मनुष्यों के बीच उसकी विशिष्टता के बारे में चिल्लाता है। उसने अंतरिक्ष में तारों को लटका दिया, पृथ्वी को उसकी जगह में रखा, और जो कुछ भी उसमें मौजूद है उसने उसे बनाया। फिर भी वह सबसे दीन व्यक्ति है जो कभी इस ग्रह पर चला करता था । वह सम्पूर्ण परमेश्वर है; फिर भी पूर्ण मनुष्य । वह सम्पूर्ण परमेश्वर है, ऐसा लगता है जैसे वह मनुष्य नहीं है। और वह पूर्ण मनुष्य, ऐसा लगता है जैसे वह परमेश्वर नहीं है। अपने सुसमाचार में, युहन्ना ने उसे परमेश्वर का पुत्र कहा। लूका ने उसे मनुष्य का पुत्र कहा। मत्ती ने उसे राजा के रूप में वर्णित किया, और मरकुस ने उसे एक सेवक के रूप में लिखा। वह परमेश्वर है जो मनुष्य बन गया; वह राजा है जो सेवक बन गया । वह परमेश्वर -मनुष्य है: परमेश्वर मानवीय शरीर में आया । उसका नाम इम्मानुएल है: परमेश्वर हमारे साथ है।

एक मनुष्य के रूप में, यीशु विजयी था। वह किसी अन्य व्यक्ति की तरह जीवन व्यतीत नहीं किया । वह किसी अन्य व्यक्ति की तरह नहीं चला । उसने पूरी तरह से पवित्र और पूर्ण जीवन बिताया और चला करता था । अगर हम समझ सकते हैं कि वह एक मनुष्य के रूप में कैसे रहता था, तो हम जान सकते हैं कि एक जयवंत जीवन कैसे बिताया जाए, क्योंकि वह हमारा उदाहरण है। एक जयवंत मसीही जीवन बिताने का रहस्य उसके उदाहरण को देखना और उसका पालन करना है ।

यीशु पूर्ण तौर से पवित्र आत्मा पर निर्भर व्यक्ति था। अपने जन्म से लेकर मृत्यु तक, वह पवित्र आत्मा की शक्ति में बना रहा उसने पवित्र आत्मा की आवाज़ सुनी और उसकी आज्ञाओं का पालन किया । यीशु ने कहा, “जब तुम मनुष्य के पुत्र को उठाओगे, तब तुम जान जाओगे कि मैं वही हूं जिसका मैं दावा करता हूं और मैं अपने आप से  कुछ नहीं करता, बल्कि सिर्फ वही बोलता हूं जो पिता ने मुझे सिखाया है” (युहन्ना 8: 28)। यीशु ने पवित्र आत्मा की शक्ति में बात की, चला फिरा, और जीवन बिताया ।

जयवंत मसीही जीवन का रहस्य कोई बड़ा रहस्य नहीं है। यीशु पवित्र आत्मा पर पूरी तरह से निर्भर व्यक्ति था । अगर उसने महसूस किया कि उसे परमेश्वर की आत्मा पर निर्भर रहने की आवश्यकता है, तो हमें उससे कितनी अधिक आवश्यकता है? हमें उसी तरह जीवन बिताना सीखना चाहिए जैसे कि उसने किया: यह हमारी अपनी शक्ति या बल से  नहीं, बल्कि जीवित परमेश्वर की आत्मा से।

यह जरूरी नहीं कि हमारे पास एक रहस्यमय अनुभव हो और हमें सभी प्रकार के दर्शन मिलें । इसका सीधा सा मतलब है कि उसकी आवाज सुनना, उसकी परिपूर्णता को समझना और उसके वचन का पालन करना। यह अलौकिक, स्वभाविक जीवन है। यह बहुतायत का जीवन है। इसका अर्थ वही जो यीशु ने उस बताया जब उसने कहा “मैं दाखलता हूँ; तुम डालियाँ हो, यदि कोई व्यक्ति मुझमें बना रहे और मैं उसमें बना रहूँ तो वह बहुतायत से फल लाएगा, मुझसे अलग होकर तुम कुछ नहीं कर सकते  ”(यूहन्ना 15:5)।

यीशु जयवंत है | यदि हम उस पर पूर्ण तौर पर निर्भर रहें तो उसके जीवन और विजय को ले सकते हैं । एक सबसे बड़ा सत्य जो मैंने आज तक एक विश्वासी के रूप में सीखा है वो यह कि ये “मैं नहीं, बल्कि मसीह है जो मेरे अंदर जीवत है।” वह जीत का स्रोत है।

जैसा कि हम इस वर्ष क्रिसमस मनाते हैं, मैं आपको क्रिसमस कहानी के पीछे के महान अर्थों को देखने के लिए चुनौती देता हूं। परमेश्वर एक मनुष्य बन गया। जो आपके और मेरे लिए विजय की उम्मीद लेकर आया । “दुनिया के लिए आनन्द ! प्रभु आ चुका है ! ”

यूहन्ना 15:1-8

1 सच्ची दाखलता मैं हूं; और मेरा पिता किसान है। 2 जो डाली मुझ में है, और नहीं फलती, उसे वह काट डालता है, और जो फलती है, उसे वह छांटता है ताकि और फले। 3 तुम तो उस वचन के कारण जो मैं ने तुम से कहा है, शुद्ध हो। 4 तुम मुझ में बने रहो, और मैं तुम में: जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे, तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते। 5 मैं दाखलता हूं: तुम डालियां हो; जो मुझ में बना रहता है, और मैं उस में, वह बहुत फल फलता है, क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते। 6 यदि कोई मुझ में बना न रहे, तो वह डाली की नाईं फेंक दिया जाता, और सूख जाता है; और लोग उन्हें बटोरकर आग में झोंक देते हैं, और वे जल जाती हैं। 7 यदि तुम मुझ में बने रहो, और मेरी बातें तुम में बनी रहें तो जो चाहो मांगो और वह तुम्हारे लिये हो जाएगा। 8 मेरे पिता की महिमा इसी से होती है, कि तुम बहुत सा फल लाओ, तब ही तुम मेरे चेले ठहरोगे।

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

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