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एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

शिष्यता का दैनिक वीडियो

प्रार्थना, घमण्ड और दीनता 

दुनिया भर में यात्रा करते हुए मुझसे अक्सर यह पूछा जाता है, “आप प्रभावशाली रूप से प्रार्थना कैसे करते हैं?” शिष्यों ने भी यीशु से एक ऐसा ही कहा, “प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखाइए।” शायद यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक है। मैं सच में उस परमेश्वर से वार्तालाप कैसे कर सकता हूँ जिसने पूरे ब्रह्माण्ड को सृजा? इस प्रश्न का उत्तर अपने आप जीवन के बाकी सभी कठिन प्रश्नों का उत्तर भी दे देगा।

यीशु ने अपने शिष्यों को कई बातें सिखाईं परन्तु सबसे महत्वपूर्ण यह थी कि “प्रार्थना कैसे करें।” मत्ती 6 अध्याय में, उसने अपने शिष्यों को प्रार्थना के महान सिद्धाँत सिखाए। 7 अध्याय में, उसने उन्हें प्रार्थना की निरन्तरता सिखाई। लूका 18 अध्याय में यीशु ने प्रार्थना की दृढ़ता के विषय में एक दृष्टाँत बताया। यूहन्ना 17 अध्याय में, उसने उन्हें प्रार्थना का एक उदाहरण दिया। उसने जो कुछ भी सिखाया उस सब में एक बात सामान्य दिखाई देती है और वह है – प्रार्थना एक नम्र हृदय की अभिव्यक्ति है। सच्ची प्रार्थना नम्र व्यक्ति ही कर सकता है, घमण्डी नहीं।

यह धार्मिक “प्रार्थना” और “खरी” प्रार्थना के बीच का बड़ा फर्क है। प्रार्थना एक ऐसे हृदय का भाव है जो कहता है, “हे परमेश्वर, मुझे आपकी अत्यन्त आवश्यकता है। आपके बिना मैं कुछ भी नहीं कर सकता।” बल्कि बाइबल भी कहती है, “यीशु ने यह दृष्टाँत उन के लिए कहा था जो अपनी धार्मिकता पर भरोसा रखते थे और दूसरों को तुच्छ जानते थे……” (लूका 18:9)। यह दृष्टाँत उन दो व्यक्तियों के विषय में था जो प्रार्थना करने के लिए मन्दिर में गए। उनमें से एक आत्म-धर्मी और अभिमानी था। दूसरा वह था जो दीनता और टूटे मन के साथ अपने पाप लेकर आया था। यीशु ने उस दीन और टूटे हुए व्यक्ति के लिए कहा, “मैं तुम्हें सच कहता हूँ कि पहले व्यक्ति के बजाय यह दूसरा व्यक्ति परमेश्वर के समक्ष धर्मी ठहरकर अपने घर गया। क्योंकि जो अपने आप को ऊँचा करता है वह दीन किया जाएगा और जो अपने आप को दीन बनाता है उसे ऊँचा किया जाएगा।”

“प्रार्थना कैसे करें” उतनी कठिन बात नहीं है जितनी यह लगती है। ऐसा कोई जादूई फॉर्मूला नहीं है जो आपको प्रार्थना करना सिखा सके। सबसे पहली और मुख्य आवश्यकता है आपके पास ऐसा हृदय होना जो यह पुकारे, “प्रभु, मुझे आपकी आवश्यकता है!” यीशु ने कहा ऐसे हृदय को ऊँचा किया जाएगा। परन्तु जो हृदय कहता है, “मैं ठीक हूँ” वह दीन किया जाएगा। दीनता, शक्तिशाली प्रार्थना की पहली आवश्यकता है।

अक्सर मैं कमज़ोर, ज़रूरतमन्द और भावनात्मक रूप से घायल लोगों में शक्तिशाली प्रार्थना को देखता हूँ। दुनिया भर में यात्रा करते हुए मैं अक्सर ऐसे लोगों से मिलता हूँ जो राजनैतिक और सामाजिक रूप से कुचले गए हैं परन्तु इन परिस्थितियों ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से महान प्रार्थना योद्धा बना दिया। ऐसा नहीं लगता कि उनके पास कोई योजना है परन्तु केवल एक टूटा हुआ दीन हृदय है। जब दीन हृदय स्वर्ग की ओर प्रार्थना करते हैं तो स्वर्ग से उत्तर पृथ्वी पर उतर आते हैं। मैंने अफ्रीका और पूर्वी यूरोप में सताई गई कलीसिया के आसूँओं की सुगन्ध से उन क्षेत्रों में परमेश्वर की महिमा को फैलते देखा है। मैंने अज्ञात प्रार्थना योद्धाओं को उनकी दीन प्रार्थनाओं से पूरे-पूरे समुदायों को मसीह के लिए जीतते देखा है।

जैसे दीनता एक प्रार्थना योद्धा का महान गुण है वैसे ही एक ऐसी चीज़ भी है जो परमेश्वर के लोगों के लिए उनकी प्रार्थनाओं के उत्तर पाने में बाधा बन सकती है और वह है घमण्ड। घमण्ड एक ऐसा चोर है जो एक ही उद्देश्य के साथ निकलता है और वह है प्रार्थना की हमारी शक्ति को चुराना। हममें से जो लम्बे समय से मसीही हैं वह इस चोर को आसानी से अपने हृदयों में घुसने देते हैं। हमने परमेश्वर को कार्य करते देखा है। परमेश्वर के साथ हमारे कुछ अनुभव रहे हैं। धीरे-धीरे परन्तु निश्चय ही हम यह सोचने लगते हैं कि हम तो मसीही जीवन के विशेषज्ञ हैं। परन्तु परमेश्वर के राज्य में कोई विशेषज्ञ नहीं हैं। यह तो साधारण, दीन पुरूष और स्त्रियों से बना है।

प्रार्थना एक दीन हृदय की अभिव्यक्ति है। अभिमान के लिए कोई स्थान नहीं है। यदि आप जानना चाहते हैं कि प्रार्थना कैसे की जाती है तो बस मुँह के बल गिर जाइए और पुकारिए “सहायता।”

लूका 18: 9-14

9और उस ने कितनो से जो अपने ऊपर भरोसा रखते थे, कि हम धर्मी हैं, और औरों को तुच्छ जानते थे, यह दृष्टान्त कहा। 10कि दो मनुष्य मन्दिर में प्रार्थना करने के लिये गए; एक फरीसी था और दूसरा चुंगी लेने वाला। 11फरीसी खड़ा होकर अपने मन में यों प्रार्थना करने लगा, कि हे परमेश्वर, मैं तेरा धन्यवाद करता हूं, कि मैं और मनुष्यों की नाईं अन्धेर करने वाला, अन्यायी और व्यभिचारी नहीं, और न इस चुंगी लेने वाले के समान हूं। 12मैं सप्ताह में दो बार उपवास करता हूं; मैं अपनी सब कमाई का दसवां अंश भी देता हूं। 13परन्तु चुंगी लेने वाले ने दूर खड़े होकर, स्वर्ग की ओर आंखें उठाना भी न चाहा, वरन अपनी छाती पीट-पीटकर कहा; हे परमेश्वर मुझ पापी पर दया कर। 14मैं तुम से कहता हूं, कि वह दूसरा नहीं; परन्तु यही मनुष्य धर्मी ठहराया जाकर अपने घर गया; क्योंकि जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा; और जो अपने आप को छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा॥

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित  इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते  है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित  से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।

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