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परमेश्वर की महिमा – प्रार्थना मे हमारा उद्देश

यदि हम सफल होना चाहते हैं, तो हम जो भी काम करते हैं उसके लिए एक निश्चीत और स्पष्ट लक्ष्य होना चाहिए. ये लक्ष्य ही वो चीज़ है जिसे हम पाना चाहते हैं. इसी ने हमे प्रार्थना मे उत्साहित करना चाहिए. जब तक परमेश्वर ने दिए लक्ष्य पूरे होते हैं, जरूरी नही कि सारी चीज़े हमारी योजना के अनुसार ही काम करना चाहिए. जब यीशु ने अपने चेलों को प्रार्थना करनी सिखाई, उसका मुख्य उद्देश स्पष्ट था – परमेश्वर की महिमा. मसीह के प्रार्थना के जीवन में यही एक मात्र उद्देश था.

जब यीशु ने अपने चेलों को प्रार्थना करनी सिखाई, उसने उन्हें प्रार्थना का ऐसा अंत करने के लिए कहा, “क्योंकि राज्य, पराक्रम और महिमा सदा तेरी ही है. आमीन” (मत्ती ६:१३ ब). सारी चीजों का मुख्य अंत यही था कि उसने यही सिखाया कि राज्य, पराक्रम और महिमा सदा परमेश्वर की ही हो. जब यीशु ने युहन्ना १७ अध्याय मे याजक की वो महान प्रार्थना की, तब हम जैसे उसके दिल मे देखते है, हम चकित हो जाते हैं कि वो परमेश्वर की महिमा के बारे मे कितना भरा था. उसने महिमा शब्द का उपयोग “क्रियापद” और “नाम” के रूप मे ८ बार किया है. यीशु, परमेश्वर की महिमा चाहता था और वो चाहता था कि उसके चेले परमेश्वर की महिमा जाने.

मैंने अकसर लोगों को अच्छी प्रार्थना करते हुए सुना – बीमारों के लिए प्रार्थना, संसार मे सुसमाचार प्रचार के लिए प्रार्थना, चर्च के लिए प्रार्थना, जागृती के लिए प्रार्थना, और सुरक्षा के लिए प्रार्थना. मै विश्वास करता हूँ कि परमेश्वर चाहता है कि हम ऐसी प्रार्थनाएं करें. लेकिन प्रार्थनाओं मे हमारा लक्ष्य इन सभी निवेदनों से बहुत बहुत ऊँचा होना चाहिए. हमें केवल एक ही चीज़ के लिए प्रार्थना करनी चाहिए – परमेश्वर की महिमा के लिए. बाकि सारी प्रार्थनाएं हमारे जीवन पर परमेश्वर की महान बुलाहट का लक्ष्य चूक जाती है.

हम अकसर बड़ी और उत्तम चीजों के लिए प्रार्थना करते हैं. हम प्रार्थना करते हैं, ज्यादा लोगों के लिए, बड़ी भीड़ के लिए, और उत्तम धन के लिए. लेकिन परमेश्वर चाहता है कि हम उसका चेहरा निहारे.  वो हमारे दिल के उद्देशों को देखता है. जब शमूएल इस्राएल का अगुवा कौन होगा ये निश्चित करनेवाला था, तब परमेश्वर ने उससे धीरे से कहा, “न तो उसके रूप पर दृष्टि कर और न उसके कद की ऊँचाई पर, क्योंकि मैंने उसे अयोग्य जाना है; क्योंकि यहोवा का देखना मनुष्य का सा नही है; मनुष्य तो बाहर का रूप देखता है, परन्तु यहोवा की दृष्टि मन पर रहती है” (१ शमुएल १६:७).

जागृती तब आती है जब हमारे दिल की पुकार परमेश्वर की महिमा के लिए होती है. जब हमारे दिल की गहरी इच्छा परमेश्वर की महिमा के लिए होती है तब सुसमाचार प्रचार सबसे ज्यादा प्रभावी होता है. चर्च तब बढता है जब उनका मुख्य उद्देश परमेश्वर की महिमा होता है. युद्ध जीते जाते हैं. जब हम सारी चीजों से बढ़कर उसकी महिमा खोजते हैं तब विजय खोली जाती है.

परमेश्वर अपनी महिमा किसी के साथ नही बांटता है. वो ही सारी महिमा, आदर और स्तुति के योग्य है. उसे के जैसा कोई नही है. जब हमारा दिल एक चीज़ और केवल एक ही चीज़ चाहता है – परमेश्वर की महिमा – तो हम परमेश्वर को असाधारण काम करते हुए देखेगे. यही हमारी प्रार्थना की जिज्ञासा होनी चाहिए. यही हमारी इच्छा को प्रसन्न करने वाला होना चाहिए. ओ, परमेश्वर की महिमा! हमारा दिल परमेश्वर की महिमा देखने की इच्छा से कितना भर जाना चाहिए. तब हम जानेगे कि मसीह के दिल के साथ प्रार्थना करने का क्या अर्थ है.

यूहन्ना 17 :24-26

17सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर: तेरा वचन सत्य है। 18जैसे तू ने जगत में मुझे भेजा, वैसे ही मैं ने भी उन्हें जगत में भेजा। 19और उन के लिये मैं अपने आप को पवित्र करता हूं ताकि वे भी सत्य के द्वारा पवित्र किए जाएं। 20मैं केवल इन्हीं के लिये बिनती नहीं करता, परन्तु उन के लिये भी जो इन के वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों। 21जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूं, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिये कि जगत प्रतीति करे, कि तू ही ने मुझे भेजा। 22और वह महिमा जो तू ने मुझे दी, मैं ने उन्हें दी है कि वे वैसे ही एक हों जैसे की हम एक हैं। 23मैं उन में और तू मुझ में कि वे सिद्ध होकर एक हो जाएं, और जगत जाने कि तू ही ने मुझे भेजा, और जैसा तू ने मुझ से प्रेम रखा, वैसा ही उन से प्रेम रखा। 24हे पिता, मैं चाहता हूं कि जिन्हें तू ने मुझे दिया है, जहां मैं हूं, वहां वे भी मेरे साथ हों कि वे मेरी उस महिमा को देखें जो तू ने मुझे दी है, क्योंकि तू ने जगत की उत्पत्ति से पहिले मुझ से प्रेम रखा। 25हे धामिर्क पिता, संसार ने मुझे नहीं जाना, परन्तु मैं ने तुझे जाना और इन्होंने भी जाना कि तू ही ने मुझे भेजा। 26और मैं ने तेरा नाम उन को बताया और बताता रहूंगा कि जो प्रेम तुझ को मुझ से था, वह उन में रहे और मैं उन में रहूं॥

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित  इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते  है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित  से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।

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