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माफ करना – परमेश्वर के अनुग्रह को प्रतिउत्तर देना है
दिल की दो मनोदशा है जो किसी व्यक्ति की प्रार्थनाओं मे से सामर्थ छीन लेती है – दोषभावना और कडवाहट. दोषभावना हमारे गलत काम करने के कारण आती है, जब की कडवाहट हमारे दिल मे धीरे धीरे तब आती है जब कोई हमारे साथ बुरा व्यवहार करता है. जब यीशु ने अपने चेलों को प्रार्थना करनी सिखाई, उसने दिल की इन दोनों मुश्किल बातों से व्यवहार किया. उसने प्रार्थना करनी सिखाई, “जैसे हम अपने अपराधियों को माफ करते हैं, वैसे ही हमारे अपराध माफ कर” (मत्ती ६:१२).
दो तरह की दोषभावना होती है – झूठी दोषभावना और सच्ची दोषभावना. झूठी दोषभावना शैतान के आरोपों के कारण आती है. वो हम से कहता है कि हम अच्छे नही हैं, या हम योग्य नही हैं. वो कोशिश करता है कि हम सोचने लगे, “तुम कैसे प्रार्थना कर सकते हो? तुम प्रार्थना करने के योग्य नही हो?” अवश्य ही हम प्रार्थना करने के योग्य नही हैं. केवल एक ही है – और उसका नाम यीशु है! केवल एक ही है, जो अपनी भलाई मे परिपूर्ण है – वो है यीशु! याने हम कभी योग्य नही हो सकते है. हम केवल उद्धारक के चरणों पर गिरकर, वही योग्य है ये जानकर उसकी आराधना कर सकते हैं. हमने जो किया है उसके कारण हम परमेश्वर के पास नही आ सकते हैं. मसीह ने हमारे लिए जो किया है उसके कारण हम परमेश्वर के पास आ सकते है.
शैतान के आरोप हमेशा सामान्य ही होते हैं, जब कि पवित्र आत्मा की सच्ची कायालता बहुत ही सटीक होती है. अकसर हम दोषी महसूस करते है क्योंकि हम दोषी होते हैं, हमारे जीवन मे ऐसा कुछ होता है जो प्रभु को प्रसन्न नही करता है. “प्रार्थना करने के योग्य न होने” के लिए पश्चाताप करना असंभव है, क्योंकि हम कभी योग्य नही होगे. इसलिए,जब शैतान हम पर झूठे आरोपों का भारी बोझ रखना चाहता है, हमें केवल अयोग्यता की उस भावना का इनकार कर यीशु के चरणों में गिरकर उसके अनुग्रह का दवा करना है. हमें समझना होगा कि परमेश्वर का सिंहासन अनुग्रह का सिंहासन है. हम पवित्र परमेश्वर तक इसलिए पहुँच सकते हैं क्योंकि हमने प्रभु के अनुग्रह का स्वाद लिया है.
फिर भी दूसरी तरह की दोषभावना होती है. ये तब आती है जब पवित्र आत्मा हमारे पाप के बारे मे कायल करता है, और ऐसी कायलता हेमशा बहुत ही सटीक होती है. इसलिए, ये कायलता हमेशा पश्चाताप की ओर लेकर आती है, फिर अंत मे, माफी आती है. जब परमेश्वर हमारे जीवन की किसी गलत बात के बारे मे कायल करता है, उसका उद्देश हमें दोषभावना की यात्रा मे भेजना नही है, लेकिन इसके बजाए ये होता है कि हमारे जीवन से पाप हटकर हमारे दिल में माफी लाए. परमेश्वर की कायलता का उद्देश हमेशा छुटकारे के लिए ही होता है.
इस तरह की दोषभावना के साथ निपटने का केवल एक ही तरीका है. इसका अंगीकार करे और इससे पश्चाताप करे. यूहन्ना की पत्री में, वो कहता है, “यदि हम कहें कि हम में कुछ भी पाप नही, तो अपने आप को धोका देते हैं, और हम में सत्य नही है. यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है” (१ यूहन्ना १:८-९). अंगीकार के लिए इमानदारी लगती है. हमें ये मानना होगा कि हमने गलत काम किया है और हमें गलत काम से मुड जाना होगा. ये केवल “मुझे माफ करना” कहने से बहुत बढ़कर है. ये पुकारना है “मै गलत था.”
मैंने ये जाना कि बहुत से विश्वासियों के लिए “मै गलत था” ये कहना मुश्किल होता है, लेकिन प्रार्थना में सामर्थ के लिए इसी चीज़ की जरूरत होती है, ऐसा अंगीकार सीधा उसके अंदर तक जाता है. बाइबल कहती है, “लेकिन वो हमें और अनुग्रह देता है.” इसलिए वचन कहता है, “परमेश्वर घमंडीयों का विरोध करता और नम्र पर दया करता है” (याकूब ४:६). घमंडी दिल मे कभी प्रार्थना की सामर्थ नही होगी, लेकिन नम्र दिल परमेश्वर के सारे स्रोत खोलता है क्योंकि वो परमेश्वर के दिल को स्पर्श करता है. जब हम प्रभु को उसकी पवित्रता मे देखते है, तो हम पाप का अंगीकार करने के लिए अपने घुटनों पर आएगे. एक बार जब हम पूरी तरह से इमानदार, टूटे हुए और पश्चाताप मे आएगे, हम अद्भुत अनुग्रह का अनुभव करेगे. ओ, ऐसी प्रार्थना मे कितना आनंद और सामर्थ होती है. पवित्र दिल से प्रार्थना करना. नम्र दिल से प्रार्थना करना. और स्थिर रहकर प्रभु का काम देखना.
याकूब 4 :4-10
4हे व्यभिचारिणयों, क्या तुम नहीं जानतीं, कि संसार से मित्रता करनी परमेश्वर से बैर करना है सो जो कोई संसार का मित्र होना चाहता है, वह अपने आप को परमेश्वर का बैरी बनाता है। 5क्या तुम यह समझते हो, कि पवित्र शास्त्र व्यर्थ कहता है जिस आत्मा को उस ने हमारे भीतर बसाया है, क्या वह ऐसी लालसा करता है, जिस का प्रतिफल डाह हो? 6वह तो और भी अनुग्रह देता है; इस कारण यह लिखा है, कि परमेश्वर अभिमानियों से विरोध करता है, पर दीनों पर अनुग्रह करता है। 7इसलिये परमेश्वर के आधीन हो जाओ; और शैतान का साम्हना करो, तो वह तुम्हारे पास से भाग निकलेगा। 8परमेश्वर के निकट आओ, तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा: हे पापियों, अपने हाथ शुद्ध करो; और हे दुचित्ते लोगों अपने हृदय को पवित्र करो।
9दुखी होओ, और शोक करा, और रोओ: तुम्हारी हंसी शोक में और तुम्हारा आनन्द उदासी में बदल जाए। 10प्रभु के साम्हने दीन बनो, तो वह तुम्हें शिरोमणि बनाएगा।
Book of the Month
Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe. For all other books…
सेमी टिपित सेवकाई के विषय में
एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।
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