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परमेश्वर के हृदय के बोझ अनुसार प्रार्थना करना

प्रार्थना दो हृदयों की संगति है – परमेश्वर का हृदय और मनुष्य का हृदय। इसका अर्थ है परमेश्वर के साथ घनिष्ठता। प्रार्थना की समझ इसे एक साहसिक यात्रा बनाती है। प्रार्थना कोई ऐसी धार्मिक रस्म नहीं है जहाँ पुरुष और स्त्रियों को परमेश्वर के सामने अपने निवेदनों को बार-बार दोहराना होता है। यह किसी धार्मिक प्रथा या कर्तव्य से कहीं बढ़कर है। प्रार्थना का अर्थ है उसकी उपस्थिति में आना जिसने सृष्टि की रचना की, वह जो पूर्णतः शुद्ध है। प्रार्थना का अर्थ है अपने हृदयों को उसके साथ बाँटना और उसे अपने हृदय को हमारे साथ बाँटने देना।

जब हम यह समझ जाते हैं कि प्रार्थना दो हृदयों की संगति है तो इससे हमें सामर्थ्य मिलता है कि हम निश्चय और शक्ति के साथ प्रार्थना करें ताकि हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर मिलें। इस बात पर विचार कीजिए और आप जान जाएँगे कि अद्भुत शक्ति के साथ प्रार्थना कैसे की जाती है। प्रार्थना में दो हृदय शामिल होते हैं – परमेश्वर का हृदय और मनुष्य का हृदय। परमेश्वर का हृदय पवित्र, सिद्ध और पूरी तरह शुद्ध है। इसकी क्षमता अवर्णनीय है। दूसरी ओर मनुष्य का हृदय है। बाइबल मनुष्य के हृदय को पापमय, धोखेबाज़ और बेहद दुष्ट कहती है। यह छोटा है और अपने ही ज्ञान और दायरे में सीमित है।

प्रार्थना करते हुए हमें मनुष्य के पापमय हृदय और परमेश्वर के महान और अद्भुत हृदय में से अधिक ध्यान किस पर लगाना चाहिए? निश्चय ही, परमेश्वर के हृदय पर। अगला प्रश्न यह उठता है, “तो परमेश्वर के हृदय में है क्या?” यदि हमें इस प्रश्न का उत्तर पता हो तो हम उन बातों के लिए प्रार्थना करना आरम्भ कर सकते हैं जो परमेश्वर के हृदय में हैं। जब हम उन बातों के लिए प्रार्थना करते हैं जो परमेश्वर के हृदय में हैं तो हम निश्चित हो सकते हैं कि वह हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर अवश्य देगा।

बाइबल कहती है, “और हमें उसके सामने जो हियाव होता है, वह यह है; कि यदि हम उस की इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो हमारी सुनता है और जब हम जानते हैं, कि जो कुछ हम माँगते हैं वह हमारी सुनता है, तो यह भी जानते हैं, कि जो कुछ हम ने उस से माँगा, वह पाया है” (1 युहन्ना 5:14)। जब हम उन बातों के अनुसार प्रार्थना करते हैं जो परमेश्वर के हृदय में हैं तो हम निश्चित हो सकते हैं कि वह हमारी सुन रहा है। इसलिए, शक्तिशाली प्रार्थना का अर्थ है उन बातों के विषय में प्रार्थना करना जो परमेश्वर के हृदय में हैं।

तो परमेश्वर के हृदय में है क्या? यह कोई रहस्य नहीं है। उसका हृदय अस्थिर नहीं है। यह बदलता नहीं है। उसके हृदय में यह संसार है। यीशु ने कहा,, “क्योंकि परमेश्वर ने संसार से ऐसा प्रेम किया कि उसने अपना एकलौता पुत्र दे दिया ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे नाश न हो परन्तु अनन्त जीवन पाए” (युहन्ना 3:16)। संसार! संसार! परमेश्वर के हृदय में यह संसार है!

प्रार्थना तब एक शक्तिशाली प्रार्थना में बदलती है जब हम संसार के लिए प्रार्थना करने लगते हैं अर्थात जब हम, जैसे स्वर्ग में, वैसे ही इस संसार में “उसके राज्य के आने और उसकी इच्छा के पूरे होने के लिए” प्रार्थना करते हैं। इसका अर्थ है लोगों के मसीह के पास आने के लिए प्रार्थना करना। इसका अर्थ है उन लोगों के उद्धार के लिए प्रार्थना करना जिन्होंने कभी मसीह को नहीं जाना है। इसका अर्थ है यह प्रार्थना करना कि मसीह, पुरुष और स्त्रियों के हृदयों में अपने राज्य को स्थापित करे।

बहुत सारे लोगों को अपने प्रार्थना जीवन में निराशा का सामना इस कारण से करना पड़ता है क्योंकि उनका सारा ध्यान उन बातों के लिए प्रार्थना करने पर होता है जो उनके अपने हृदय में होती हैं। निश्चय ही परमेश्वर को आपके हृदय की बातों में रूचि हैं परन्तु उन बातों को लेकर हमारी समझ एक हद तक सीमित है और अक्सर हमारे हृदय उन बातों के विषय में हमें धोखा दे जाते हैं। परन्तु जब हम उन बातों के लिए प्रार्थना करते हैं जो परमेश्वर के हृदय में हैं तो हम बड़े निश्चय और भरोसे के साथ प्रार्थना कर सकते हैं। वह अवश्य सुनेगा और अवश्य उत्तर देगा। शक्तिशाली प्रार्थना का अर्थ है परमेश्वर के हृदय के बोझ अनुसार प्रार्थना करना।

16क्योंकि परमेश्वर ने जगत से ऐसा प्रेम रखा कि उस ने अपना एकलौता पुत्र दे दिया, ताकि जो कोई उस पर विश्वास करे, वह नाश न हो, परन्तु अनन्त जीवन पाए।

17परमेश्वर ने अपने पुत्र को जगत में इसलिये नहीं भेजा, कि जगत पर दंड की आज्ञा दे परन्तु इसलिये कि जगत उसके द्वारा उद्धार पाए।

18जो उस पर विश्वास करता है, उस पर दंड की आज्ञा नहीं होती, परन्तु जो उस पर विश्वास नहीं करता, वह दोषी ठहर चुका; इसलिये कि उस ने परमेश्वर के एकलौते पुत्र के नाम पर विश्वास नहीं किया। 19और दंड की आज्ञा का कारण यह है कि ज्योति जगत में आई है, और मनुष्यों ने अन्धकार को ज्योति से अधिक प्रिय जाना क्योंकि उन के काम बुरे थे। 20क्योंकि जो कोई बुराई करता है, वह ज्योति से बैर रखता है, और ज्योति के निकट नहीं आता, ऐसा न हो कि उसके कामों पर दोष लगाया जाए।

21परन्तु जो सच्चाई पर चलता है वह ज्योति के निकट आता है, ताकि उसके काम प्रगट हों, कि वह परमेश्वर की ओर से किए गए हैं।

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

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