Enter your keyword

एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

शिष्यता का दैनिक वीडियो

प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखा

शिष्यों ने यीशु को कई अद्भुत काम करते देखा था। उन्होंने उसे पानी को दाखमधु में परिवर्तित करते, बीमारों को चंगा करते, दुष्टात्माओं को निकालते, असाधारण सन्देश सुनाते, यहाँ तक कि मृतकों को जीवित करते देखा था। तौभी उन्होंने उसे कभी नहीं कहा कि वह उन्हें भी इनमें से कोई कार्य करना सिखाए। परन्तु उन्होंने इतना अवश्‍य कहा, “प्रभु, हमें प्रार्थना करना सिखाइए” (लूका 11:1)। वे जानते थे कि उसके सब महान कामों का रहस्य था उसका प्रार्थना जीवन। वह भोर में लंबा समय प्रार्थना में व्यतीत करता था। वह उसके विजय के रहस्य को जानना चाहते थे।

लूका 11:1 में यीशु ने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया। वचन का ऐसा ही एक भाग मत्ती 6: 9-13 में भी मिलता है। इस भाग में यीशु प्रार्थना के पाँच सिद्धान्त सिखाते हैं। प्रत्येक सिद्धान्त का साराँश परमेश्‍वर के किसी विशेष गुण के प्रतिउत्तर के रूप में निकाला जा सकता है। प्रार्थना का अर्थ है परमेश्‍वर को जानना। जब हम उसे उसके पूर्ण वैभव और महिमा में देखते हैं तो हम अपने हृदय उसके समक्ष उण्डेलने लगते हैं। तब प्रार्थना एक ऐसा महान साहसिक कार्य बन जाती है जिसे कोई भी कर सकता है। मुझसे अक्सर यह पूछा जाता है कि जब कोई व्यक्ति प्रार्थना करता है तो वह क्या करता है। लोगों को अक्सर ऐसा लगता है कि प्रार्थना में आधे या एक घण्टे के दौरान वे क्या करेंगे। परन्तु जब हम इन सिद्धान्तों का अभ्यास करने लगते हैं तो प्राय: हम पाएँगे कि हमें प्रार्थना के लिए और समय की आवश्‍यकता है।

तो हमें किस प्रकार से प्रार्थना करनी चाहिए और यीशु ने कौन से सिद्धान्त सिखाए?

पहला सिद्धान्त है स्तुति और धन्यवाद का सिद्धान्त। मत्ती 6:9 में यीशु, परमेश्‍वर को प्रमुख रखते हुए प्रार्थना का द्वार खोलता है। वह शिष्यों को परमेश्‍वर के इन तीन गुणों को देखना सिखाता है: क) हे हमारे पिता; ख) तू जो स्वर्ग में है; ग) तेरा नाम पवित्र माना जाए। परमेश्‍वर का पितृत्व हमें परमेश्‍वर की भलाई दिखाता है। इस गुण को समझना हमारे लिए विशेष रूप से उस समय महत्वपूर्ण है जब हमारे जीवनों में कठिन परिस्थितियाँ आती हैं। हमें यह समझना आवश्‍यक है कि परमेश्‍वर भला है और केवल हमारी भलाई ही चाहता है। जब हम उससे रोटी मांगते हैं तो वह हमें पत्थर नहीं देगा। बल्कि, यदि संसार या शैतान हमें पत्थर देता है तो वह उसे भी रोटी में बदल देगा।

“तू जो स्वर्ग में है”, यह वाक्य हमें परमेश्‍वर की महानता दिखाता है। वह अपने सिहांसन पर विराजमान है। स्वर्ग और पृथ्वी का सारा अधिकार और शक्ति उसके पास है। वह सर्वशक्तिमान परमेश्‍वर है। परन्तु इस वाक्य में यीशु हमें परमेश्‍वर की पवित्रता को दिखाता है, “तेरा नाम पवित्र माना जाए।” परमेश्‍वर का अपना एक विशेष स्थान है। हम सृष्टि हैं और वह सृष्टिकर्ता है। हम पापपूर्ण हैं परन्तु वह पूर्ण पवित्रता है। पूरे ब्रह्माण्ड में उसके समान कोई नहीं है। इसलिए हमें श्रद्वा में उसको दण्डवत करना चाहिए। हम परमेश्‍वर की भलाई के लिए उसका धन्यवाद करते हैं – उन सब अच्छी बातों के लिए जो उसने हमारे लिए की हैं। जो वह है हम उसके लिए उसकी स्तुति करते हैं – उसके गुणों और उसके चरित्र के लिए। इसलिए जब हम प्रार्थना करते हैं तो पहले कुछ देर इस पर विचार करें कि परमेश्‍वर क्या है और उसने हमारे लिए क्या किया है। उसकी पवित्रता की सुन्दरता में उसकी आराधना करें। हमारे जीवनों में उसके सामर्थी कार्यों के लिए उसका धन्यवाद करें।

मत्ती 6:10 में पाया जाने वाला दूसरा सिद्धान्त मध्यस्थता का सिद्धान्त है। शिष्यों को परमेश्‍वर के गुणों के बारे में बताने के बाद यीशु उन्हें संसार की आवश्‍यकताएँ दिखाता है। परमेश्‍वर के विषय में बात करने के बाद अब यीशु परमेश्‍वर के राज्य और पृथ्वी पर उसकी इच्छा के बारे में बता रहा है। जब हम परमेश्‍वर को जानना शुरू करते हैं तो हम चाहने लगते हैं कि हम जानें कि उसके हृदय में क्या है। पर परमेश्‍वर के हृदय में है क्या? उसमें आज भी वही है जो 2000 वर्ष पूर्व था। परमेश्‍वर के हृदय में लोगों के लिए बोझ है (यूहन्ना 3:16)! हमें उन लोगों के लिए प्रार्थना करना शुरू करना चाहिए जिन्हें मसीह की आवश्‍यकता है कि परमेश्‍वर का राज्य आए और उनके जीवनों में परमेश्‍वर की इच्छा पूरी हो। यह प्रार्थना का सबसे शक्तिशाली रूप है जिसके बारे में मैं जानता हूँ, क्योंकि यह प्रार्थना सीधे परमेश्‍वर के हृदय तक पहुँचती है। जब हम परमेश्‍वर के हृदय, उसके राज्य और उसकी इच्छा के साथ सहमत हो जाते हैं तो वह स्वर्ग को पृथ्वी पर ला सकता है।

तीसरा सिद्धान्त है विनती का सिद्धान्त (मत्ती 6:11)। जब यीशु ने अपने शिष्यों को परमेश्‍वर से प्रतिदिन की रोटी के लिए प्रार्थना करना सिखाया तो ऐसा करके उसने उन्हें अपनी आवश्‍यकताएँ परमेश्‍वर के सामने रखना सिखाया। भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्‍यकता है। यीशु चाहता है कि उसके शिष्य परमेश्‍वर को यहोवा यिरे, परमेश्‍वर-उनके पोषक, के रूप में जानें। परमेश्‍वर अपनी सन्तान की आवश्‍यकताएँ पूरी करने की इच्छा रखता है। वह हमसे प्रेम करता है और हमारी देखभाल करता है। हमें अपनी आवश्‍यकताएँ प्रतिदिन परमेश्‍वर के सामने रखनी चाहिएँ। वह हमें आज्ञा देता है कि हम ऐसा करें। उस क्रम पर ध्यान दें जिससे यीशु ने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया। सबसे पहले, उनका विषय केवल परमेश्‍वर है। फिर उनका विषय है, पृथ्वी पर आने वाला परमेश्‍वर का राज्य। हम दूसरों के लिए प्रार्थना करें और अंत में, हम अपनी आवश्‍यकताएँ परमेश्‍वर के पास लेकर आएँ। यीशु ने प्रार्थना में जो प्राथमिकताएँ अपने शिष्यों को सिखाईं, वह ये थीं- पहले परमेश्‍वर, फिर दूसरे लोग, और तीसरे नम्बर पर हमारी अपनी आवश्‍यकताएँ। परन्तु हम में से अधिकतर इसके विपरीत क्रम में प्रार्थना करते हैं।

जब हम एक बार अपनी आवश्‍यकताएँ परमेश्‍वर के पास लाना आरम्भ करते हैं तो यीशु हमारे हृदय की गहनतम आत्मिक आवश्‍यकतायों को उजागर करने लगता है। चौथा सिद्धान्त है क्षमा का सिद्धान्त, जोकि परमेश्‍वर की पवित्रता और अनुग्रह का हमारी ओर से प्रतिउत्तर है। ये सिद्धान्त जोकि मत्ती 6:12 में बताया गया है, हमें सिखाता है कि हमें अपने जीवनों में परमेश्‍वर के अनुग्रह और क्षमा के लिए उस पर निर्भर रहना आवश्‍यक है। हमारे लिए अनुग्रह के उस गहरे कुएँ में से लेना आवश्‍यक है ताकि हम दूसरों को क्षमा कर सकें। हृदय की दो ऐसी समस्याएँ हैं जो हमारे जीवनों में पराजय को लाती हैं और वे हैं अपराध बोध और कड़वाहट। वचन के इस भाग में यीशु इन दोनों के विषय में बात करता है।

अंत में, मत्ती 6:13 में यीशु अपने शिष्यों को आत्मिक युद्ध लड़ना सिखाता है। हम यीशु को ऐसे महान चरवाहे के रूप में देखते हैं जो हमारे जीवनों को एक सुरक्षित स्थान में और इस संसार के प्रलोभनों से परे ले जाता है। हम उसे बुराई की सेनाओं और शक्ति पर अपनी विजयी के रूप में देखते हैं। यीशु हमारी विजय है। जब हम अपने जीवनों के लिए प्रार्थना की उसकी योजना पर चलते हैं, तो हम विजय में जीते हैं। यीशु की ओर देखिए। आज ही उस से कहिए, “प्रभु, मुझे प्रार्थना करना सिखाइए।” जब वह अपको सिखाता है तो आप विजय पाएँगे।

ਮੱਤੀ 6 :9-13

9सो तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो; “हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। 10तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे पृथ्वी पर भी हो। 11हमारी दिन भर की रोटी आज हमें दे। 12और जिस प्रकार हम ने अपने अपराधियों को क्षमा किया है, वैसे ही तू भी हमारे अपराधों को क्षमा कर। 13और हमें परीक्षा में न ला, परन्तु बुराई से बचा; क्योंकि राज्य और पराक्रम और महिमा सदा तेरे ही हैं।” आमीन।

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित  इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते  है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित  से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।

सम्पर्क करें: info@sammytippit.org

सर्वाधिकार सुरक्षित