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एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

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प्रार्थना में डटें रहना

क्या आपने कभी सोचा कि कुछ प्रार्थनाओं का उत्तर तुरंत मिलता है और दूसरी प्रार्थनाओं के उत्तर पाने के लिए कई साल लग जाते हैं? मैंने अपने परिवार के साथ के सम्बंध में अक्सर इसके बारे में सोचा. अक्सर मैंने लोगों के लिए प्रार्थना की कि वो मसीह के पास आएं और ऐसा दिखाई देता था कि केवल कुछ ही दिनों में या हफ्तों में वो मसीह के पास आ गए. लेकिन मेरे परिवार के लिए ये मुश्किल था.

जब मैंने मसीह को जाना, मै चाहता था कि मेरे दोस्त और मेरे परिवारवाले उस उद्धारकर्ता को जाने जिसे मैंने पाया है. मै मसीह के प्यार के बारे में उत्साहित था और मै उस प्यार को अपने प्रिय लोगों के साथ बाँटना चाहता था. जब मैंने मेरी माँ को बताया कि मेरे जीवन में क्या हुआ, उसने जवाब दिया, “मै मसीही नही हूँ और न कभी बनूँगी. फिर कभी मुझे मसीह के बारे में नही बताना.”

जब आप अपनी माँ से परमेश्वर के बारे में बात नही कर सकते तब आप क्या करेगे? मै आप को बताऊंगा कि मैंने क्या किया. मैंने मेरी माँ के बारे में परमेश्वर से बात की. लेकिन ऐसा दिखाई दे रहा था कि मै जितनी प्रार्थना कर कर रहा था ये उतना मुश्किल होते जा रहा था. मै उनसे प्यार करता था और चाहता था कि वो अनुग्रह के द्वारा आनेवाले उद्धार के बारे में जाने, जिसे मैंने जाना था. लेकिन मै केवल प्रार्थना ही कर सकता था.

मैंने पुरे एक साल प्रार्थना की, फिर ५ साल, मै १० साल तक निरंतर प्रार्थना करते रहा. लेकिन किसी से कुछ मदत नही मिल रही थी. मैंने बीस साल तक प्रार्थना की और फिर मैंने लगभग महसूस किया कि ये आशाहीन परिस्थिती है. जब मै प्रार्थना करने में हिम्मत हारने ही वाला था, मुझे उनकी ओर से एक फोन आया. उन्होंने कहा, “सैमी, मै एक घमंडी स्त्री हो गई हूँ, मै एक कडवी स्त्री हो गई हूं, मुझे परमेश्वर की जरूरत है. मुझे यीशु की जरूरत है. मुझे चर्च की जरूरत है.”

मै जो सुन रहा था उस पर विश्वास नही कर पाया. परमेश्वर ने मेरी प्रार्थनाओं का उत्तर दिया. बीस साल से भी ज्यादा समय तक मैंने प्रार्थना की थी. परमेश्वर विश्वासयोग्य है, और मेरी माँ ने मसीह को जाना. उन्होंने फोन पर मेरे साथ प्रार्थना की कि वो जीवन भर यीशु पर भरोसा रखेगी. उनके जीवन के अंतिम दस साल में उनका सबसे पसंदीदा काम था प्रार्थना सभा में जाना. मेरी माँ को मसीह में बढते हुए देखना सच में बहुत आनंद की बात थी.

इस दौरान, इन बीस सालों में परमेश्वर ने मेरे जीवन में अद्भुत काम किया है. उसने मुझे उसके उपर आधारित रहने की जगह पर रखा था. मेरी माँ को मसीह के पास आने के लिए इतने साल क्यों लग गए इसका कारण मै नही समझ सकता हूँ. लेकिन मै इतना जानता हूं, कि उत्तर की कमी ने मुझे परमेश्वर के सिंहासन के सामने घुटनों पर रखा. इसने मुझे परमेश्वर का चेहरा निहारने लगाया.

यीशु ने चेलों को प्रार्थना में डटें रहने के लिए एक दृष्टांत बताया. ये कहानी अद्भुत है, ये कहती है, “फिर यीशु ने अपने चेलों को निरंतर प्रार्थना करना और हियाव न छोड़ने के लिए एक दृष्टान्त दिया” (लूका १८:१). हियाव छोडना बहुत आसान है – निराश होकर छोड देना. लेकिन परमेश्वर हमें उसके पास आने के लिए चुनैती देता है. वो चाहता है कि हम निरंतर प्रार्थना में बने रहें.

निरंतर बने रहने का उद्देश ये नही कि परमेश्वर को ऐसा करने के लिए विवश करे जो वो नही करना चाहता है. ये उसे जानने के लिए है – उस मामले में उसकी इच्छा जानना है. किसी बात के लिए हम उसकी उपस्थिति में जितना ज्यादा आएगे, उतना हम उसे नजदीकी से जान पाएगे. उसके दिल में क्या है ये जानेगे. अंत में, हम केवल अपनी प्रार्थनाओं का उत्तर ही नही खोजेगे, लेकिन हम उससे भी महान अनुभव पाएगे. हम उसे जान पाएगे. इसलिए वो चाहता है कि हम डटें रहें. वो चाहता है कि हम उसके साथ समय बिताए – ताकि हम उसे जान पाए. मेरी माँ का मसीह के पास आना मेरी प्रार्थनाओं का महान उत्तर था. लेकिन प्रार्थनाओं का उत्तर न पाने के इतने साल की सबसे उत्तम बात ये है कि उस कारण मै परमेश्वर को खोजते रहा. डटें रहें और परमेश्वर को जाने.

ਲੂਕਾ 11:5 -13

5और उस ने उन से कहा, तुम में से कौन है कि उसका एक मित्र हो, और वह आधी रात को उसके पास आकर उस से कहे, कि हे मित्र; मुझे तीन रोटियां दे।

6क्योंकि एक यात्री मित्र मेरे पास आया है, और उसके आगे रखने के लिये मेरे पास कुछ नहीं है।

7और वह भीतर से उत्तर दे, कि मुझे दुख न दे; अब तो द्वार बन्द है, और मेरे बालक मेरे पास बिछौने पर हैं, इसलिये मैं उठकर तुझे दे नहीं सकता

8मैं तुम से कहता हूं, यदि उसका मित्र होने पर भी उसे उठकर न दे, तौभी उसके लज्ज़ा छोड़कर मांगने के कारण उसे जितनी आवश्यकता हो उतनी उठकर देगा।

9और मैं तुम से कहता हूं; कि मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूंढ़ों तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिये खोला जाएगा।

10क्योंकि जो कोई मांगता है, उसे मिलता है; और जो ढूंढ़ता है, वह पाता है; और जो खटखटाता है, उसके लिये खोला जाएगा।

11तुम में से ऐसा कौन पिता होगा, कि जब उसका पुत्र रोटी मांगे, तो उसे पत्थर दे: या मछली मांगे, तो मछली के बदले उसे सांप दे?

12या अण्डा मांगे तो उसे बिच्छू दे?

13सो जब तुम बुरे होकर अपने लड़के-बालों को अच्छी वस्तुएं देना जानते हो, तो स्वर्गीय पिता अपने मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों न देगा॥

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित  इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते  है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित  से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।

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