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परमेश्वर का ज्ञान
बाइबल में कहे गए सबसे उत्तम वाक्यों में से एक प्रेरित पौलुस के द्वारा कहा गया वाक्य है जब उसने कहा, “ताकि मैं उसे, उसके जी उठने की शक्ति, उसके दुखों की संगति और उसकी मृत्यु के अनुभव को जानूँ।” पौलुस पहले ही मसीह को जान चुका था। जब वह दमिश्क को जा रहा था तो मार्ग में यीशु ने स्वयं को उस पर प्रकट किया था। उसका परिवर्तन अदभुत था। कोई भी इस बात से इनकार नहीं कर सकता था कि पौलुस ने मसीह को जान लिया था। फिर पौलुस ने यह क्यों कहा कि वह यीशु को जानना चाहता था?
पौलुस की यीशु को जानने की इच्छा की तुलना एक प्रकार से मेरी पत्नी को जानने की मेरी इच्छा के साथ की जा सकती है। उदाहरण के लिए, जब मैं उससे मिला तो मुझे उससे “प्रेम हो गया” और फिर हमने शादी कर ली। हमारी शादी होने के बाद मैं कह सकता था कि मैं अपनी पत्नी को पूरी तरह से “जानता” हूँ। अब, आज पैंतीस वर्ष बाद मैं कह सकता हूँ कि, “मैं उसे और अच्छी तरह से जानता हूँ।” जानता तो मैं उसे पैंतीस वर्ष पहले भी था परन्तु अब मैं सचमुच उसे जानता हूँ और मैं उसे और अधिक जानना चाहता हूँ। जितना अधिक मैं उसे जान रहा हूँ उतना अधिक मैं उससे प्रेम कर रहा हूँ। बिल्कुल यही बात पौलुस यीशु के साथ अपने सम्बन्ध के विषय में कह रहा था। वह यीशु को जानता था और उससे प्रेम करता था। परन्तु वह उसे और अधिक जानना और प्रेम करना चाहता था।
पौलुस तीन तरीकों से यीशु को जानना चाहता था और हमें भी उन्हीं तरीकों से यीशु को जानने की इच्छा करनी चाहिए। सबसे पहले, वह यीशु को उसके पुनरुत्थान की शक्ति में जानना चाहता था। जिस शक्ति ने यीशु को मृतकों में से पुनर्जीवित किया, वही शक्ति प्रत्येक विश्वासी के लिए भी उपलब्ध है। किसी को भी पराजित होने की आवश्यकता नहीं है। बाइबल कहती है कि हम मसीह के साथ जिलाए गए और स्वर्गीय स्थानों में बिठाए गए। हम मसीह के पुनरुत्थान के कारण विजयी हैं। उसने मनुष्य को ज्ञात हर शत्रु को हरा दिया चाहे वह पाप हो, मृत्यु, नरक या शैतान। इसलिए, “हम विजेता से भी बढ़कर” हैं। पौलुस मसीह को इस शक्ति में व्यवहारिक रूप में जानना चाहता था। हमारे हृदयों में भी मसीह को उसके पुनरुत्थान की शक्ति में जानने की ऐसी ही गहरी चाह होनी चाहिए।
परन्तु पौलुस मसीह को उसके दुखों की संगति में भी जानना चाहता था। बहुत सारे मसीह परमेश्वर की शक्ति को जानना चाहते हैं परन्तु बहुत कम हैं जो मसीह के दुखों को जानना चाहते हैं। परन्तु मैंने पाया है कि परमेश्वर के प्रेम की गहराई को केवल दुखों के मध्य में ही अनुभव किया जा सकता है। अक्सर पीड़ा ही हमें उद्धारकर्ता की बाहों में लेकर जाती है। मसीह को उसके दुखों में जानना कोई डरने वाली बात नहीं है, बल्कि यह तो परमेश्वर के साथ एक ऐसा सम्बन्ध है जिसे अपनाया जाना चाहिए। जैसे कि एक लेखक ने बिल्कुल सही लिखा है, “अपने दुखों कि व्यर्थ ना जाने दो।” दुखों को केवल सहिए मत, परन्तु इन्हें अपनाइए और परमेश्वर को अनुमति दीजिए कि वह स्वयं को आप पर और भी गहराई के साथ प्रकट कर पाए।
वह अंतिम तरीका जिससे पौलुस मसीह को जानना चाहता था, वह था मसीह की मृत्यु में शामिल होना। मसीह जीवन की परिपूर्णता “पुराने जीवन को उतारने और नए मनुष्यत्व को पहनने में है।” ऐसा करने के लिए हमारा स्वयं के लिए मरना आवश्यक है। पौलुस जानता था कि परमेश्वरका ज्ञान और घमण्ड की आत्मा एक ही हृदय में निवास नहीं कर सकते। जितना अच्छी तरह से हम परमेश्वर को जानते जाते हैं उतना ही हम स्वयं के लिए मरते जाते हैं। इसीलिए युहन्ना बपतिस्ता ने कहा, “वह बढ़े और मैं घटूँ।” (युहन्ना 3:30)। उसे जानने का अर्थ है अपनी स्वार्थी इच्छाओं, चाहतों और महत्वकाँक्षाओं के प्रति मर जाना।
एक विजयी मसीही जीवन वह है जो मसीह को जानने के लिए समर्पित होता है। उसे जानने का अर्थ है उससे प्रेम करना!
इब्रानियों 11:१-६
1विश्वास उन बातों का पक्का निश्चय है, जिनकी हम आशा करते हैं और उन वस्तुओं के अस्तित्व के विषय में दृढ़ धारणा है, जिन्हें हम नहीं देखते। 2विश्वास के कारण हमारे पूर्वज परमेश्वर के कृपापात्र समझे गए। 3विश्वास द्वारा हम जान लेते हैं कि परमेश्वर के शब्द द्वारा विश्व का निर्माण हुआ है और अदृश्य से दृश्य की उत्पत्ति हुई है। 4विश्वास के कारण हाबिल ने काइन की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ बलि चढ़ायी। विश्वास के कारण वह धार्मिक समझा गया, क्योंकि परमेश्वर ने उसका चढ़ावा स्वीकार किया। उसकी मृत्यु हुई; किन्तु विश्वास के कारण वह आज भी बोल रहा है।
5विश्वास के कारण हनोक ले लिया गया ताकि उसे मृत्यु का अनुभव न हो। वह फिर नहीं दिखाई पड़ा, क्योंकि परमेश्वर ने उसे उठा लिया था। धर्मग्रन्थ उसके विषय में कहता है कि उठाये जाने के पहले “उसने परमेश्वर को प्रसन्न किया था।” 6और विश्वास के बिना परमेश्वर को प्रसन्न करना, असंभव है। अत: जो परमेश्वर के निकट पहुँचना चाहता है, उसे विश्वास करना आवश्यक है कि परमेश्वर है और वह उन लोगों को प्रतिफल देता है, जो उसकी खोज में लगे रहते हैं।
Book of the Month
Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe. For all other books…
सेमी टिपित सेवकाई के विषय में
एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।
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