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एक विजयी के समान दोड़ना

दौड़ जिस में हमें दौड़ना है, धीरज से दौड़ें।

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प्रार्थना के माध्यम से परमेश्वर को जानना

मसीही जीवन में विजय का स्रोत परमेश्वर का घनिष्ठ ज्ञान है। यदि आप उस दिन, जिस दिन मैं पहली बार अपनी पत्नी से मिला था, मुझसे पूछते, “क्या आप Debe “Tex” Sirman नाम की किसी लड़की को जानते हैं?” तो मेरा जवाब होता, “हाँ, जानता हूँ। उस दिन मैं उससे मिला भी था।” तथापि, उस समय जब मैंने कहा था कि मैं उसे जानता हूँ और आज जब मैं कहता हूँ कि मैं उसे जानता हूँ, इन दोनों में बहुत अन्तर है। अब मेरे पास उसके बारे में जो घनिष्ठ ज्ञान है, वह उस समय नहीं था। अब मैं उसकी पसंद और नापसंद, निर्बलताएँ और गुण तथा आनन्द और दुखों को जानता हूँ। जब मैं उससे पहली बार मिला था तो मुझे पता चल गया था कि मुझे उससे प्यार हो गया है। परन्तु आज मुझमें उसके लिए जो प्यार है वह पहले से भी कहीं अधिक गहरा तथा भरपूर है। क्योंकि हमने अलग-अलग हालात देखे हैं और बहुत सारी कठिनाइयों का मिलकर सामना किया है, इसलिए हमारा प्यार बहुत बढ़ गया है। परमेश्वर के साथ भी ऐसा ही है। आप परमेश्वर को जितना अधिक जानेंगे, उतना ही अधिक उससे प्रेम करेंगे। जब हम घाटियों से लेकर पर्वत शिखरों तक उसके साथ-साथ चलते हैं तो उसके लिए हमारा प्रेम बहुत बढ़ जाता है। परन्तु यदि हम परमेश्वर को घनिष्ठतापूर्वक जानना चाहते हैं तो उस में समय लगता है।

प्रेरित पौलुस के हृदय की गहन चाहत थी कि वह “उसको और उसके मृत्युंजय की सामर्थ को और उसके साथ दुखों में सहभागी होने के मर्म को जाने और उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त करे” (फिलिप्पियों 3:10)। पौलुस मसीह को पर्वत शिखरों पर भी जानना चाहता था और घाटियों में भी। वह कठिन समयों के साथ-साथ अच्छे समयों में भी मसीह के साथ चलना चाहता था क्योंकि वह जानता था कि मसीह के साथ उसका सम्बन्ध इसी प्रकार लम्बी घनिष्ठता के दौरान ही विकसित होगा।

परन्तु व्यावहारिक तौर पर हम परमेश्वर को कैसे जानें? हम उसका प्रेम तथा देखभाल कैसे प्राप्त करें? परमेश्वर आत्मा है। तो जिस परमेश्वर को न तो हम देख सकते हैं और न ही छू सकते हैं, उसके साथ हम ऐसा गहरा सम्बन्ध कैसे बनाएँ? मसीह के साथ घनिष्ठता बढ़ाने का एक तरीका प्रार्थना है।

बहुत लोग प्रार्थना को केवल परमेश्वर से कुछ न कुछ प्राप्त करने का माध्यम मानते हैं। हाँ यह सच है कि परमेश्वर हमारी विनतियों के अनुसार अपनी सन्तान के लिए बहुतायत से देता है। वास्तव में, वह तो हमारे माँगने से, यहाँ तक कि हमारी सोच से भी बढ़कर देने में सक्षम है। परन्तु प्रार्थना परमेश्वर से हमारी माँगें पूरी करवाने के माध्यम से भी बढ़कर कुछ है। प्रार्थना दो हृदयों के बीच एक वार्तालाप है। इसमें हम अपने जीवन की गुप्त बातें उसे बताते हैं तथा वह अपने हृदय की गुप्त बातें हमें बताता है।

हम में से कई लोग हारा हुआ मसीही जीवन इसलिए जी रहे हैं क्योंकि आज तक प्रार्थना के बारे में हमारी समझ गलत ही रही है। हम प्रार्थना को ऐसे समय के रूप में देखते हैं जिसमें हम “आसमान में एक विशाल सैन्टा क्लॉज़” के पास जाते हैं और उसे सब कुछ बता देते हैं कि हमें क्या-क्या चाहिए। प्रार्थना के बारे में ऐसा छिछला नज़रिया केवल हार की ओर ही ले जा सकता है। ऐसा नहीं हो सकता कि जैसे हम अपने हाथ में सामान की सूची लेकर किसी दुकान में जाते हैं, उसी प्रकार हम पवित्र, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में भी आएँ।

किसी भी सम्बन्ध को विकसित होने में समय लगता है। मेरे और मेरी पत्नी के बीच में अद्भुत तथा गहरा सम्बन्ध स्थापित करने में कई वर्ष लग गए क्योंकि हमनें अपने दिल की बातें एक दूसरे को बताने में समय बिताया था। प्रत्येक सप्ताह हम प्रयास करते हैं कि हम फ़ोन, दफ्तर और बाकी सभी कामों से दूर रहकर कुछ समय एकसाथ बिताएँ। हम एक दूसरे को अपने दिल की बातें बताने में समय बिताते हैं। हम पूरे सप्ताह में अपने साथ हुई समस्याएँ, दुख, कठिनाइयाँ और सफलताएँ एक दूसरे के साथ बाँटते हैं। हमारे सम्बन्ध में सबसे अधिक कठिनाई उस समय आई है जब हमने एक दूसरे से बात करने में समय नहीं बिताया है।

प्रार्थना में भी ऐसा ही होता है। परमेश्वर के साथ बात करने तथा उसके हृदय की गहराइयों से बातें सुनने में भी समय बिताना पड़ता है। शायद इसीलिए यीशु ने अपने शिष्यों से कहा कि जब तुम प्रार्थना करो तो अपनी कोठरी में जाओ और द्वार बन्द करके प्रार्थना करो, तब तुम्हारा पिता जो गुप्त में सुनता है तुम्हें सबके सामने प्रतिफल देगा (मत्ती 6:6)। प्रार्थना किसी प्रकार की धार्मिक प्रदर्शनी नहीं है जिसमें हम अपनी आत्मिकता से दूसरों को प्रभावित करें। यह कोई धार्मिक कर्त्तव्य या बोझ नहीं है। सबसे पहले, प्रार्थना एक ऐसा समय है जिसमें हम जीवन अस्त-व्यस्तता से अलग होकर परमेश्वर के साथ समय बिताते हैं ताकि हम अपने हृदय की गहन बातें परमेश्वर के साथ बाँट सकें। प्रार्थना परमेश्वर की आवाज़ सुनने में समय बिताना है। यह ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता के साथ संगति करना है।

अक्सर इस सिद्धान्त के बारे में मुझे चुनौती मिलती रहती है। कुछ लोग कहते हैं, “हमें हमेशा प्रार्थना के व्यवहार में बने रहना चाहिए। इस प्रकार हमें परमेश्वर के लिए विशेष तौर पर समय निकालना ही नहीं पड़ेगा।” यह सच है कि हमें “बिना रुके प्रार्थना करनी है” और हमें अपने दैनिक जीवन में प्रार्थना का व्यवहार बनाए रखने का प्रयास करना है। परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें परमेश्वर के साथ निरंतर एकान्त में समय नहीं बिताना और उसके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध को विकसित नहीं करना है। यीशु ने अपने शिष्यों को प्रार्थना करना सिखाया। जब उन्हें भी संसार की उलझनों से दूर होकर परमेश्वर के साथ संगति करने के लिए एकान्त में समय बिताना पड़ा तो हमें उस प्रकार के समय तथा स्थान की कितनी अधिक जरूरत है। यदि आप अपने मसीही जीवन में सचमुच विजय चाहते हैं, तो इसे अपना आरम्भिक स्थान बना लीजिए। हालाँकि यहाँ विजय के लिए सबकुछ तो उपलब्ध नहीं है परन्तु आरम्भ करने के लिए यह बहुत उत्तम स्थान है। क्यों न आप भी एकान्त स्थान ढूँढ लें और परमेश्वर से मुलाकात करने के लिए एक समय निर्धारित करें। उसे अपने दिल की बातें बताएँ। उसका वचन पढ़ें और उसकी आवाज़ सुनें। वह जो भी आप से कहे उसका आज्ञापालन करें। आपको विजय जरूर मिलेगी।

फिलिप्पियों 3:५-११

 5आठवें दिन मेरा खतना हुआ था। मैं इस्राएली, बिन्‍यामिन वंशीय और इब्रानियों की इब्रानी सन्‍तान हूँ। व्‍यवस्‍था-पालन की दृष्‍टि से मैं फरीसी था। 6मेरा धर्मोत्‍साह ऐसा था कि मैंने कलीसिया पर अत्‍याचार किया। व्‍यवस्‍था पर आधारित धार्मिकता की दृष्‍टि से मैं निर्दोष था।

7किन्‍तु मैं जिन बातों को लाभ समझता था, उन्‍हें मसीह के कारण हानि समझने लगा हूँ। 8इतना ही नहीं, मैं अपने प्रभु येशु मसीह को जानना सर्वश्रेष्‍ठ लाभ मानता हूँ और इस ज्ञान की तुलना में हर वस्‍तु को हानि ही मानता हूँ। उन्‍हीं के लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया है और उसे कूड़ा समझता हूँ, जिससे मैं मसीह को प्राप्‍त करूँ 9और उनके साथ पूर्ण रूप से एक हो जाऊं। मुझे अपनी धार्मिकता का नहीं, जो व्‍यवस्‍था के पालन से मिलती है, बल्‍कि उस धार्मिकता का भरोसा है, जो मसीह में विश्‍वास करने से मिलती है। उस धार्मिकता का उद्गम परमेश्‍वर है और उसका आधार विश्‍वास है।10मैं यह चाहता हूँ कि मसीह को जान लूँ। उनके पुनरुत्‍थान के सामर्थ्य का अनुभव करूँ और मृत्‍यु में उनके सदृश बन कर उनके दु:खभोग का सहभागी बन जाऊं,11जिससे मैं किसी तरह मृतकों के पुनरुत्‍थान तक पहुँच सकूँ।

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

एसटीएम लगभग 50 वर्षों से दुनिया भर में प्रेरणा और सहायता प्रदान कर रहा है। सैमी टिपित  इसके संस्थापक और अध्यक्ष है, वह एक विश्व प्रसिद्ध परामर्शदाता, शिक्षक और सुसमाचार के प्रचारक हैं जो 80 से अधिक देशों में लोगों की सेवा करने और उनकी सहायता करने का अनुभव रखते हैं। सैमी ऐसी सामग्री प्रदान करते  है जो लोगों को सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक मुद्दों से निपटने में मदद करती है। वह विशेष रूप से दुनिया भर के अन्य देशों के लिए सामग्री सुलभ बनाने के बारे में भावुक है। सैमी ने डेबरा “टेक्स” टिपित  से शादी की है, और उनके दो बच्चे और पांच नाती पोते हैं। सैमी टिपित सेवकाई पंजीकृत 501c3 गैर-लाभकारी संगठन है।

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