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एक विजयी के समान दोड़ना

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प्रार्थना की प्राथमिकता

दुनिया भर में यात्रा करते हुए मैंने पाया है कि आज कलीसियाएँ बहुत तेज़ी से बढ़ रही हैं। हम शायद कह सकते हैं कि कलीसिया के इतिहास में यह वह समय है जब मसीहत सबसे अधिक तेज़ी से बढ़ रही है। जिन लोगों ने अब तक सुसमाचार को नहीं सुना था वह पहली बार सुसमाचार को सुन रहे हैं। जिन देशों में लोग अब तक मसीहीयत का विरोध करते आए थे वह भी अब मसीह के लिए अपने हृदयों को खोल रहे हैं और उसके पीछे चल रहे हैं। बहुत सारे इतिहासकार यह मानते हैं कि हम कलीसिया के इतिहास के अन्तिम अध्याय को देख रहे हैं और उनका ऐसा मानने के पीछे जो कारण है वह मनुष्य की गिरावट नहीं परन्तु बाइबल की इस भविष्यवाणी का पूरा होना है; यीशु ने कहा, “और राज्य का यह सुसमाचार सारे जगत में प्रचार किया जाएगा, कि सब जातियों पर गवाही हो, तब अन्त आ जाएगा” (मत्ती 24:14)।

अब यह पढ़कर कुछ लोग सोच रहे होंगे कि “यह सब हो कहाँ रहा है? कम से कम मेरी कलीसिया में, मेरे समुदाय या मेरे देश में तो ऐसा नहीं हो रहा है।”

इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। यह अविश्वसनीय कलीसिया वृद्धि उन देशों में और उन लोगों में हो रही है जिन्होंने प्रार्थना को प्राथमिकता बना लिया है। जब कलीसिया प्रार्थना करती है तो परमेश्वर कार्य करता है। बस इतनी सी बात है। इतिहास में जो महान मसीही क्रान्तियाँ आईं वह हमेशा महान प्रार्थना आन्दोलनों के बाद ही आईं। परमेश्वर के राज्य के विस्तार की अगुवाई प्रार्थना करने वाले दीन पुरुष और स्त्रियों के द्वारा की गई।

जब यीशु ने कलीसिया की स्थापना की तो पहले उसने इसे प्रार्थना में पैदा किया। स्वर्ग उठाए जाने से पहले उसने अपने शिष्यों से कहा, “जब तक तुम ऊपर से सामर्थ्य न पाओ तब तक नगर में ही रहो” (लूका 24:49)। प्रेरितों के काम की पुस्तक में जो कलीसिया है उसे प्रार्थना अपने अस्तित्व में आने के साथ ही मिली। यह कलीसिया उन प्रारम्भिक दिनों में लगातार प्रार्थना करती रही और परिणामस्वरूप, बढ़ती गई।

प्रार्थना प्रथम कलीसिया की प्राथमिकता थी। यदि हम परमेश्वर को अपने व्यक्तिगत जीवनों में या अपनी कलीसियाओं में कार्य करते देखना चाहते हैं तो हमें भी प्रार्थना के जन बनना आवश्यक है। प्रार्थना को हमारे जीवनों में प्रथम स्थान लेना ही होगा। बहुत वर्ष पहले मैं एक कलीसिया वृद्धि सभा में बोल रहा था। उसी सभा में बहुत तेज़ी से बढ़ती हुई एक कलीसिया का एक पासबान भी प्रचार कर रहा था। उसने अपनी कलीसिया की शानदार बढ़ौतरी के विषय में बताया। उसने लोगों तक मसीह का सुसमाचार ले जाने के अपने तरीकों की प्रासंगिकता के विषय में भी बताया।

परन्तु, उस कलीसिया के विषय में एक बात मुझे पता थी जो उसने नहीं बताई। यह बात मुझे इसलिए पता थी क्योंकि मैं वहाँ कई बार प्रचार कर चुका था। वह बात यह थी कि वह जब भी प्रचार करने के लिए खड़ा होता था तो उसकी कलीसिया में से कई पुरुष उसी समय उसके दफ़तर में अपने मुँह के बल गिरकर परमेश्वर से प्रार्थना कर रहे होते थे। वह आत्माओं के लिए रोते थे। जो बात उस कलीसिया को अन्दर से सहारा दिए हुए थी वह थी प्रार्थना। हाँ, सुसमाचार प्रचार के लिए उन्होंने सृजनात्मक तरीके अपनाए थे परन्तु बाइबल के हर तरीके के पीछे जो शक्ति है वह प्रार्थना ही है।

परमेश्वर बदला नहीं है। वह “कल, आज और सदा एक सा है।” वह मात्र ऐसे लोगों को ढूँढ रहा है जिन्होंने प्रार्थना को अपनी प्राथमिकता बनाया है। वह उन लोगों की तलाश में है जिन के हृदय स्वर्ग की ओर लगे हुए हैं। जब हमारी प्राथमिकताएँ उसके उद्देश्यों से मेल खाती हैं तो हमारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है। वह अभी भी अपने सिंहासन पर विराजमान है। वह कार्य करेगा और जब वह करेगा तो अपनी अद्भुत शक्ति के साथ करेगा। वह प्रतीक्षा कर रहा है। अपनी प्राथमिकताओं को सही क्रम में लाएँ और देखें कि वह कैसे कार्य करता है।

लूक्स २४:४४-४९

44येशु ने शिष्‍यों से कहा, “मैं ने तुम्‍हारे साथ रहते समय तुम लोगों से कहा था कि जो कुछ मूसा की व्‍यवस्‍था में और नबियों के ग्रंथों में तथा भजन-संहिता में मेरे विषय में लिखा है, सब का पूरा होना अनिवार्य है।” 45तब येशु ने शिष्‍यों की बुद्धि खोल दी कि वे धर्मग्रन्‍थ को समझ सकें, 46और उन से कहा, “धर्मग्रन्‍थ में ऐसा ही लिखा है कि मसीह दु:ख भोगेंगे, तीसरे दिन मृतकों में से जी उठेंगे 47और उनके नाम पर यरूशलेम से ले कर सभी राष्‍ट्रों को पापक्षमा के लिए पश्‍चात्ताप का संदेश सुनाया जाएगा। 48तुम इन बातों के गवाह हो। 49देखो, मेरे पिता ने जिस वरदान की प्रतिज्ञा की है, उसे मैं तुम पर भेजूँगा। इसलिए जब तक तुम ऊपर के सामर्थ्य से सम्‍पन्न न हो जाओ, तुम नगर में ठहरे रहो।”

Book of the Month

Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe.  For all other books…

सेमी टिपित सेवकाई के विषय में

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