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दाउद : जब परमेश्वर ना कहता है
अगर मेरे जीवन में कोई चीज है जिसकी कमी कभी नहीं हो सकती तो ये मेरे सपने हैं। स्वभाव से, मैं एक सपने देखने वाला व्यक्ति हूं। मैं मसीह बनने से पहले एक सपने देखने वाला व्यक्ति था, और उस महान दिन से जब मैंने प्रभु को ग्रहण किया था तब भी मैंने सपने देखना जारी रखा। मसीह में आने से पहले, मैंने उन महान उपलब्धियों का सपना देखा था जो मेरी बढ़ाई करती थी । मेरे जीवन पर परमेश्वर आने के बाद मैं उसकी महिमा, राज्य और शक्ति को देखने के सपने देखने लगा।
लेकिन मेरे सारे सपने परमेश्वर से नहीं हैं। वास्तव में, उनमें से अधिकांश परमेश्वर की इच्छा में नहीं थे। एक अगुवे के रूप में मेरे सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि कौन से सपने उसके हैं और कौनसे सिर्फ मेरे अपने विचार हैं। लेकिन अक्सर सबसे बड़ी चुनौती ये होती है कि जब मैं किसी सपने के बारे में दृढ़ता से महसूस करता हूं और परमेश्वर उसे ना करते हुए सुनता हूँ ।
दाउद ने इस तरह की चुनौती का अनुभव किया। उसकी बड़ी इच्छा थी कि वाचा के सन्दूक को यरूशलेम में वापिस लाया जाए और उसे यहूदी जीवन का केंद्र बनाया जाए । उसने उस सपने को सच होते देखा। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, एक सपने की पूर्ति केवल एक बड़े सपने की ओर ले जाती है। जब दाऊद अपने महल में बस गया, तो उसने नातान नबी से कहा, “यहाँ मैं हूँ, देवदार के महल में रहता हूँ, जबकि परमेश्वर का सन्दूक एक तंबू में पड़ा है” (2 शमूएल 7: 2)। नातान ने पहले उससे कहा कि जो कुछ भी तेरे हृदय में है उसे कर । तब यहोवा ने नातान से बात की और उसे बताया कि वह दाऊद को यह बताए कि वह सन्दूक के लिए भवन नहीं बनाएगा।
दाउद के लिए, यह घातक रहा होगा। लेकिन दाउद परमेश्वर के हृदय का मनुष्य था । वह अपनी इच्छा से बढ़कर परमेश्वर की इच्छा चाहता था। यह दिलचस्प है कि जब दाउद ने नातान के शब्दों को सुना, तो वह बैठ गया और परमेश्वर के साथ लंबी बातचीत की। उसने उसके लिए आभार और प्रशंसा व्यक्त की। हम 2 शमूएल 7:28 में दाऊद द्वारा कही गई बातों का सारांश पाते हैं: “हे प्रभु यहोवा, तू परमेश्वर है! तेरे वचन भरोसे योग्य हैं, और तूने अपने सेवक को इन अच्छी चीजों का वायदा किया है। ”दाउद की यह प्रतिक्रिया हमें उसके चरित्र और नेतृत्व के बारे में सबसे अच्छी जानकारी देती है। उसे परमेश्वर के वचन और चरित्र पर गहरा भरोसा था। वह जानता था कि परमेश्वर के न कहने पर भी उस पर भरोसा किया जा सकता है – और वह अच्छा है, चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए ।
परमेश्वर की मनाही में कई महत्वपूर्ण तत्व शामिल हैं। सबसे पहले, दाउद परमेश्वर के भवन का निर्माण उसकी इच्छा से नहीं कर रहा था, लेकिन दाउद द्वारा परमेश्वर के भवन का निर्माण कोई बुरी बात भी नहीं थी। यह अच्छी और पवित्र थी । दाउद के बाद उसके पुत्र सुलेमान ने भवन का निर्माण किया, उसने यह संकेत दिया कि यह उसके लिए प्रसन्नता की बात है । “परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, तेरी जो मनसा है कि यहोवा के नाम का एक भवन बनाए, ऐसी मनसा कर के नू ने भला तो किया;” (2 इतिहास 6: 8)। परमेश्वर हमारे मन और हमारे विचारों को जानता है। हम तो सिर्फ कुछ ही बातों को देखते और समझते हैं। कोई भी यह नहीं जानता कि दाउद के उद्धेश्यों से बढकर परमेश्वर उससे प्रसन्न था ।
अक्सर इस जीवन में, हम केवल आधे रूप से देखते हैं। हम स्वर्ग में जाने पर ही परमेश्वर की इच्छा को पूरी तरह से जान पाएंगे। जब हमें परमेश्वर की इच्छा के बारे में पूरी समझ नहीं होती तो हमें हताश होने की आवश्यकता नहीं है। दाउद का सपना सही था। एक भवन बनाया जाएगा। लेकिन परमेश्वर की योजना थी कि दाउद का बेटा , सुलैमान, भवन का निर्माण करे। परमेश्वर ने दाउद से कहा, “तौभी तू उस भवन को न बनाएगा; तेरा जो निज पुत्र होगा, वही मेरे नाम का भवन बनाएगा।” (1 राजा 8:19) ।
दाऊद भवन बनाने वाला आदमी नहीं था। उसका विचार सही था, लेकिन व्यक्ति और समय गलत थे। परमेश्वर ने दाउद को नहीं छेड़ा क्योंकि उसने परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण रीति से नहीं देखा था । उसने दाउद से एक प्रेम करने वाले पिता के रूप में बात की। और दाऊद परमेश्वर पर भरोसा करना अच्छी तरह जानता था । सही समय पर भवन का निर्माण हुआ और परमेश्वर की महिमा हुई। परमेश्वर की ना ही उसकी इच्छा को पूरा करने में एक मील पत्थर बन गई । परमेश्वर के समय में, उसकी सिद्ध इच्छा पूरी हुई । दाऊद को सिर्फ प्रभु की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता थी। उसके मार्ग वास्तव में हमारी तुलना में बढ़कर हैं।
1 राजा 8:14-26
14 और राजा ने इस्राएल की पूरी सभा की ओर मुंह फेरकर उसको आशीर्वाद दिया; और पूरी सभा खड़ी रही। 15 और उसने कहा, धन्य है इस्राएल का परमेश्वर यहोवा! जिसने अपने मुंह से मेरे पिता दाऊद को यह वचन दिया था, और अपने हाथ से उसे पूरा किया है, 16 कि जिस दिन से मैं अपनी प्रजा इस्राएल को मिस्र से निकाल लाया, तब से मैं ने किसी इस्राएली गोत्र का कोई नगर नहीं चुना, जिस में मेरे नाम के निवास के लिये भवन बनाया जाए; परन्तु मैं ने दाऊद को चुन लिया, कि वह मेरी प्रजा इस्राएल का अधिकारी हो। 17 मेरे पिता दाऊद की यह मनसा तो थी कि इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम का एक भवन बनाए। 18 परन्तु यहोवा ने मेरे पिता दाऊद से कहा, यह जो तेरी मनसा है, कि यहोवा के नाम का एक भवन बनाए, ऐसी मनसा करके तू ने भला तो किया; 19 तौभी तू उस भवन को न बनाएगा; तेरा जो निज पुत्र होगा, वही मेरे नाम का भवन बनाएगा। 20 यह जो वचन यहोवा ने कहा था, उसे उसने पूरा भी किया है, और मैं अपने पिता दाऊद के स्थान पर उठ कर, यहोवा के वचन के अनुसार इस्राएल की गद्दी पर विराजमान हूँ, और इस्राएल के परमेश्वर यहोवा के नाम से इस भवन को बनाया है। 21 और इस में मैं ने एक स्थान उस सन्दूक के लिये ठहराया है, जिस में यहोवा की वह वाचा है, जो उसने हमारे पुरखाओं को मिस्र देश से निकालने के समय उन से बान्धी थी। 22 तब सुलैमान इस्राएल की पूरी सभा के देखते यहोवा की वेदी के साम्हने खड़ा हुआ, और अपने हाथ स्वर्ग की ओर फैलाकर कहा, हे यहोवा!23 हे इस्राएल के परमेश्वर! तेरे समान न तो ऊपर स्वर्ग में, और न नीचे पृथ्वी पर कोई ईश्वर है: तेरे जो दास अपने सम्पूर्ण मन से अपने को तेरे सम्मुख जानकर चलते हैं, उनके लिये तू अपनी वाचा पूरी करता, और करुणा करता रहता है। 24 जो वचन तू ने मेरे पिता दाऊद को दिया था, उसका तू ने पालन किया है, जैसा तू ने अपने मुंह से कहा था, वैसा ही अपने हाथ से उसको पूरा किया है, जैसा आज है। 25 इसलिये अब हे इस्राएल के परमेश्वर यहोवा! इस वचन को भी पूरा कर, जो तू ने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था, कि तेरे कुल में, मेरे साम्हने इस्राएल की गद्दी पर विराजने वाले सदैव बने रहेंगे: इतना हो कि जैसे तू स्वयं मुझे सम्मुख जानकर चलता रहा, वैसे ही तेरे वंश के लोग अपनी चालचलन में ऐसी ही चौकसी करें। 26 इसलिये अब हे इस्राएल के परमेश्वर अपना जो वचन तू ने अपने दास मेरे पिता दाऊद को दिया था उसे सच्चा सिद्ध कर।
Book of the Month
Sammy Tippit told his fiancée, “I can’t promise we’ll be rich, but life won’t be boring.”
Sammy had no idea what an understatement that would become. Beginning in the bars of Baton Rouge and the nightclubs of Chicago, Tippit has shared the news of life-changing faith in Christ all over the world – including in the middle of a revolution in Romania, the aftermath of genocide in Rwanda, and war in Burundi and the Congo.
Sammy’s lifelong adventure has come at a great price. He’s been cursed, threatened, arrested, deported, and blacklisted. He’s also been personally broken, ravaged with illness, and devastated by grief.
Yet he continues to preach to in stadiums, in open fields, and via satellite technology to hundreds of thousands around the globe. For all other books…
सेमी टिपित सेवकाई के विषय में
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